BRICS : नई दिल्ली में भारत को क्या मिला? स्थानीय मुद्रा व्यापार से डिजिटल इंडिया तक, भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में आयोजित 18वां BRICS शिखर सम्मेलन रविवार, 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में संपन्न हुआ। भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण, आर्थिक सहयोग, डिजिटल तकनीक, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
11 पूर्ण सदस्य देशों और साझेदार देशों की भागीदारी वाले इस सम्मेलन ने भारत को वैश्विक दक्षिण और प्रमुख शक्तियों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में स्थापित किया। सम्मेलन की आधिकारिक थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण” रही।
भारत ने BRICS को टूटने से बचाया
2024 और 2025 में BRICS के विस्तार के बाद संगठन के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई थीं। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के 2024 में शामिल होने के बाद इंडोनेशिया 2025 में इसका हिस्सा बना।
अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं वाले देशों के बढ़ते समूह को एकजुट रखना भारत के सामने बड़ी चुनौती थी। कई देशों के बीच मतभेदों के कारण यह आशंका भी जताई जा रही थी कि BRICS या तो पश्चिम विरोधी मंच बन सकता है या फिर एक निष्क्रिय संगठन में बदल सकता है।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान BRICS को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के बजाय “गैर-पश्चिमी और समाधान-केंद्रित मंच” के रूप में पेश किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को केंद्र में रखते हुए आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार पर जोर दिया।
सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 18वीं नई दिल्ली घोषणा 2026 को स्वीकार किया। इसे BRICS की एकजुटता और भविष्य की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।
ईरान, UAE और सऊदी अरब को एक मंच पर लाना बड़ी उपलब्धि
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को एक ही मंच पर साथ लाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी।
नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच गर्मजोशी देखने को मिली। वहीं UAE और सऊदी अरब के प्रतिनिधियों के साथ भी महत्वपूर्ण बातचीत हुई।
सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई। BRICS देशों ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में वाणिज्यिक सुरक्षा बनाए रखने, सैन्य टकराव से बचने और कूटनीतिक माध्यमों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
इससे भारत ने यह संदेश दिया कि वह अलग-अलग क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
भारत ने पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन साधा
BRICS सम्मेलन के दौरान भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को एक बार फिर प्रदर्शित किया।
भारत एक ओर क्वाड जैसे मंचों का हिस्सा है, तो दूसरी ओर G20 और BRICS जैसे व्यापक बहुपक्षीय संगठनों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। नई दिल्ली ने किसी एक भू-राजनीतिक खेमे के बजाय सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने “मानवता प्रथम” के दृष्टिकोण पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए विकसित अर्थव्यवस्थाओं और उभरते बाजारों के बीच सहयोग जरूरी है।
BRICS के एजेंडे में कर्ज स्थिरता, जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा और सस्ती ऊर्जा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई। इससे विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को मंच पर मजबूती मिली।
15 द्विपक्षीय बैठकों से भारत को क्या मिला?
BRICS सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। तीन दिनों के दौरान मोदी ने करीब 15 द्विपक्षीय बैठकें कीं। इन बैठकों में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, निवेश, कनेक्टिविटी और रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
Xi Jinping के साथ अहम बातचीत
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बहुप्रतीक्षित मुलाकात हुई। यह शी जिनपिंग की करीब सात साल बाद भारत यात्रा थी।
दोनों नेताओं के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर स्थिति और सैन्य तनाव कम करने के बाद हुई प्रगति की समीक्षा की गई।
दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को भारत-चीन संबंधों के लिए जरूरी आधार बताया।
बैठक में सीधी वाणिज्यिक उड़ानों को चरणबद्ध तरीके से फिर शुरू करने, तकनीकी कर्मचारियों के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने और व्यापार असंतुलन से जुड़े संवाद तंत्र को फिर सक्रिय करने की दिशा में आगे बढ़ने पर चर्चा हुई।
Putin के साथ ऊर्जा और स्थानीय मुद्रा में व्यापार पर जोर
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी BRICS सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की मुलाकात ने भी काफी ध्यान आकर्षित किया।
दोनों नेताओं के बीच ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग, कच्चे तेल और उर्वरक की आपूर्ति तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई।
भारत और रूस के बीच स्थानीय मुद्राओं में भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी बातचीत हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में आने वाली कुछ बाधाओं को कम किया जा सके।
यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत ने अपनी पुरानी स्थिति दोहराते हुए कहा कि स्थायी शांति युद्ध के मैदान में हासिल नहीं की जा सकती और इसके लिए सीधे एवं निरंतर संवाद की आवश्यकता है।
ईरान के साथ Chabahar और INSTC पर फोकस
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक में चाबहार बंदरगाह के वाणिज्यिक संचालन को तेज करने और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के विस्तार पर चर्चा हुई।
चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया और आगे यूरोप तक व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वहीं UAE और सऊदी अरब के साथ बातचीत में क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और निवेश सहयोग पर जोर दिया गया।
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।
अन्य देशों के साथ व्यापार और रक्षा सहयोग
इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस, बुरुंडी, युगांडा, कजाकिस्तान, नाइजीरिया, मलेशिया और थाईलैंड सहित कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ भारत ने व्यापार, रक्षा निर्यात और कृषि सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत की।
भारत ने विभिन्न साझेदार देशों के साथ रक्षा उपकरण, नौसैनिक गश्ती पोत और रडार सिस्टम जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी सामने रखीं।
इसके साथ ही डॉलर की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए द्विपक्षीय मुद्रा स्वैप व्यवस्था जैसे विकल्पों पर भी चर्चा हुई।
BRICS में भारत का Digital Public Infrastructure मॉडल
BRICS सम्मेलन में भारत के Digital Public Infrastructure (DPI) मॉडल को भी प्रमुखता मिली।
12 सितंबर को BRICS नेताओं ने भारत मंडपम में आयोजित “भारत इनोवेट्स प्रदर्शनी” का दौरा किया। यहां भारत ने UPI, आधार, ONDC, CoWIN और आयुष्मान भारत जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म और सेवाओं की क्षमता प्रदर्शित की।
भारत ने “BRICS DPI Repository” लॉन्च किया। इसके तहत भारत के ओपन-सोर्स और मॉड्यूलर डिजिटल पब्लिक गुड्स को सदस्य और साझेदार देशों के साथ साझा करने का प्रयास किया गया।
इससे अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के विकासशील देशों को डिजिटल सेवाओं के निर्माण में मदद मिल सकती है।
भारत के लिए इसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि इससे भारतीय फिनटेक, आईटी सेवा और साइबर सुरक्षा कंपनियों के लिए नए अंतरराष्ट्रीय अवसर पैदा हो सकते हैं।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा
BRICS देशों ने वैश्विक व्यापार में मुद्रा उतार-चढ़ाव और वित्तीय जोखिमों को देखते हुए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए।
सदस्य देशों के राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने और सीमा पार स्थानीय मुद्रा भुगतान को आसान बनाने पर जोर दिया गया।
BRICS के New Development Bank (NDB) को भी स्थानीय मुद्रा में ऋण बढ़ाने की दिशा में काम करने को कहा गया। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे, स्वच्छ ऊर्जा और शहरी विकास जैसी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।
इसके अलावा BRICS देशों के विकास बैंकों के बीच क्रेडिट लाइन बढ़ाने पर भी सहमति बनी, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मदद मिल सके।
भारत ने इस पूरी प्रक्रिया को केवल डॉलर-विरोधी अभियान के बजाय व्यापार को आसान बनाने और वित्तीय समावेशन के नजरिए से आगे बढ़ाया।
आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख
BRICS सम्मेलन की अंतिम घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ भारत को महत्वपूर्ण समर्थन मिला।
नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कही गई। इसमें सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क, आतंकवाद के लिए वित्तीय सहायता, सुरक्षित ठिकानों और आतंकवाद के समर्थन से जुड़ी गतिविधियों की निंदा की गई।
घोषणा में साइबर आतंकवाद, ऑनलाइन कट्टरपंथ और गैर-राज्य तत्वों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीकों के दुरुपयोग के खिलाफ सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
भारत के लिए यह मुद्दा लंबे समय से BRICS के एजेंडे में प्रमुख रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में सुधार के लिए भारत को समर्थन
BRICS देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता को भी दोहराया।
घोषणा में अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई। भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को भी समर्थन मिला।
इसके अलावा IMF और World Bank जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती आर्थिक भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व और कोटा व्यवस्था में सुधार की मांग की गई।
BRICS देशों ने WTO की विवाद निपटान व्यवस्था को पूरी तरह कार्यशील बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया, ताकि वैश्विक व्यापार व्यवस्था अधिक प्रभावी और निष्पक्ष रह सके।
भारत मंडपम में दिखी भारत की सांस्कृतिक ताकत
BRICS सम्मेलन के दौरान भारत की सांस्कृतिक विरासत भी दुनिया के सामने पेश की गई।
सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताओं के लिए विशेष रात्रिभोज का आयोजन किया। इसमें “BRICS Symphony – One Rhythm, Many Cultures” नाम से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इसमें भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और कथक जैसी भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों के कलाकारों ने प्रस्तुति दी। सदस्य देशों के पारंपरिक संगीत को भी इसमें शामिल किया गया।
करीब 160 कलाकारों की प्रस्तुति के जरिए भारत ने विभिन्न संस्कृतियों के बीच समानताओं और साझा सभ्यतागत संबंधों को प्रदर्शित किया।
10 बरगद के पौधे लगाए गए
BRICS नेताओं ने भारत मंडपम के परिसर में पौधारोपण कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया।
इस दौरान बरगद (Ficus benghalensis) के 10 पौधे लगाए गए। यह कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के संदेश से जुड़ा रहा।
भारत के लिए BRICS Summit 2026 का क्या मतलब?
18वें BRICS सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत ने एक तेजी से विस्तार कर रहे और अलग-अलग हितों वाले समूह को साझा एजेंडे पर साथ लाने की कोशिश की।
भारत ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख, संयुक्त राष्ट्र में सुधार, स्थानीय मुद्रा में व्यापार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को BRICS के एजेंडे में प्रमुखता दी।
चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों को संभालते हुए भारत ने पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को भी प्रभावित किए बिना रणनीतिक स्वायत्तता का संदेश दिया।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली में आयोजित BRICS Summit 2026 ने भारत को केवल मेजबान देश के रूप में नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज और अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच संवाद कराने वाले देश के रूप में पेश किया।
